Monday, 31 August 2015

☆ इस्लाम में नारी का महत्व ….

☆  इस्लाम में नारी का महत्व ….
यदि आप धर्मों का अध्ययन करें तो पाएंगे कि हर युग में महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार किया गया,
* हर धर्म में महिलाओं का महत्व पुरुषों की तुलना में कम रहा। बल्कि उनको समाज में तुच्छ समझा गया, उन्हें प्रत्येक बुराइयों की जड़ बताया गया, उन्हें वासना की मशीन बना कर रखा गया। एक तम्बा युग महिलाओं पर ऐसा ही बिता कि वह सारे अधिकार से वंचित रही।
लेकिन यह इस्लाम की भूमिका है कि उसने हव्वा की बेटी को सम्मान के योग्य समझा और उसको मर्द के समान अधिकार दिए गए।
♥ क़ुरआन की सूरः बक़रः (2: 228) में कहा गया:
“महिलाओं के लिए भी सामान्य नियम के अनुसार वैसे ही अधिकार हैं जैसे मर्दों के अधिकार उन पर हैं।”
∗ इस्लाम में महिलाओं का स्थान –
इस्लाम में महिलाओं का बड़ा ऊंचा स्थान है। इस्लाम ने महिलाओं को अपने जीवन के हर भाग में महत्व प्रदान किया है। माँ के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, पत्नी के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, बेटी के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, बहन के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, विधवा के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, खाला के रूप में उसे सम्मान प्रदान किया है, तात्पर्य यह कि विभिन्न परिस्थितियों में उसे सम्मान प्रदान किया है जिन्हें बयान करने का यहाँ अवसर नहीं हम तो बस उपर्युक्त कुछ स्थितियों में इस्लाम में महिलाओं के सम्मान पर संक्षिप्त में प्रकाश डालेंगे।
∗ माँ के रूप में सम्मानः 
माँ होने पर उनके प्रति क़ुरआन ने यह चेतावनी दी कि “और हमने मनुष्य को उसके अपने माँ-बाप के मामले में ताकीद की है – उसकी माँ ने निढाल होकर उसे पेट में रखा और दो वर्ष उसके दूध छूटने में लगे – कि ”मेरे प्रति कृतज्ञ हो और अपने माँ-बाप के प्रति भी। अंततः मेरी ही ओर आना है॥14॥ ”
कुरआन ने यह भी कहा कि – “तुम्हारे रब ने फ़ैसला कर दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें ‘उँह’ तक न कहो और न उन्हें झिझको, बल्कि उनसे शिष्‍टापूर्वक बात करो॥23॥ और उनके आगे दयालुता से नम्रता की भुजाएँ बिछाए रखो और कहो, “मेरे रब! जिस प्रकार उन्होंने बालकाल में मुझे पाला है, तू भी उनपर दया कर।”॥24॥ (सूरः बनीइस्राईल 23-25) – @[156344474474186:]
» हदीस: माँ के साथ अच्छा व्यवहार करने का अन्तिम ईश्दुत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने भी आदेश दिया,
एक व्यक्ति उनके पास आया और पूछा कि मेरे अच्छे व्यवहार का सब से ज्यादा अधिकारी कौन है?
आप ने फरमायाः तुम्हारी माता,
उसने पूछाः फिर कौन ?
कहाः तुम्हारी माता.
पूछाः फिर कौन ?
कहाः तुम्हारी माता,
पूछाः फिर कौन ? कहाः तुम्हारे पिता ।
मानो माता को पिता की तुलना में तीनगुना अधिकार प्राप्त है।
» हदीस: अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः “अल्लाह की आज्ञाकारी माता-पिता की आज्ञाकारी में है और अल्लाह की अवज्ञा माता पिता की अवज्ञा में है” – (तिर्मज़ी)
∗ पत्नी के रूप में सम्मानः –
पवित्र क़ुरआन में अल्लाह तआला ने फरमाया और उनके साथ भले तरीक़े से रहो-सहो। (निसा4 आयत 19) और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः “एक पति अपनी पत्नी को बुरा न समझे यदि उसे उसकी एक आदत अप्रिय होगी तो दूसरी प्रिय होगी।” – (मुस्लिम)
∗ बेटी के रूप में सम्मानः –
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः “जिसने दो बेटियों का पालन-पोषन किया यहां तक कि वह बालिग़ हो गई और उनका अच्छी जगह निकाह करवा दिया वह इन्सान महाप्रलय के दिन हमारे साथ होगा” – (मुस्लिम)
आपने यह भी फरमायाः जिसने बेटियों के प्रति किसी प्रकार का कष्ट उठाया और वह उनके साथ अच्छा व्यवहार करता रहा तो यह उसके लिए नरक से पर्दा बन जाएंगी” – (मुस्लिम)
∗ बहन के रूप में सम्मानः –
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः जिस किसी के पास तीन बेटियाँ हों अथवा तीन बहनें हों उनके साथ अच्छा व्यवहार किया तो वह स्वर्ग में प्रवेश करेगा” – (अहमद)
∗ विधवा के रूप में सम्मानः –
इस्लाम ने विधवा की भावनाओं का बड़ा ख्याल किया बल्कि उनकी देख भाल और उन पर खर्च करने का बड़ा पुण्य बताया है।
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः ”विधवाओं और निर्धनों की देख-रेख करने वाला ऐसा है मानो वह हमेशा दिन में रोज़ा रख रहा और रात में इबादत कर रहा है।” – (बुखारी)
∗ खाला के रूप में सम्मानः –
इस्लाम ने खाला के रूप में भी महिलाओं को सम्मनित करते हुए उसे माता का पद दिया।
हज़रत बरा बिन आज़िब कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः “खाला माता के समान है।” – (बुखारी)

Sunday, 9 August 2015

• सवाल 1. धर्म क्या है, और इसकी उत्पति कैसे हुयी ?

• सवाल 1. धर्म क्या है, और इसकी उत्पति कैसे हुयी ?
• सवाल 2. आप धर्म को क्यों मानते हो और जीवन मै इसका क्या महतव है ?
» जवाब: ● धर्म………
धर्म मौलिक मानवीय मूल्यों (अच्छे गुणों) से आगे की चीज़ है। अच्छे गुण (उदाहरणतः नेकी, अच्छाई, सच बोलना, झूठ से बचना, दूसरों की सहायता करना, ज़रूरतमन्दों के काम आना, दुखियों के दुःख बाँट लेना, निर्धनों निर्बलों से सहयोग करना आदि) हर व्यक्ति की प्रकृति का अभाज्य अंग है चाहे वह व्यक्ति किसी धर्म का अनुयायी हो,
या अधर्मी और नास्तिक। धर्म इन गुणों की शिक्षा तो देता है; इन्हें महत्व भी बहुत देता है तथा मनुष्यों और मानव-समाज में इनके प्रचलन, उन्नति व स्थापन पर पूरा ज़ोर भी देता है, परन्तु ये मानवीय गुण वह आधारशिला नहीं है जिन पर धर्म का भव्य भवन खड़ा होता है। – @[156344474474186:]
इसलिए धर्म के बारे में कोई निर्णायक नीति निश्चित करते समय बात उस बिन्दु से शुरू होनी बुद्धिसंगत है जो धर्म का मूल तत्व है। यहाँ यह बात भी स्पष्ट रहनी आवश्यक है कि संसार में अनेक मान्यताएँ ऐसी हैं जो ‘धर्म’ के अंतर्गत नहीं ‘मत’ के अंतर्गत आती हैं। इन दोनों के बीच जो अंतर है वह यह है कि ‘धर्म’ में ईश्वर को केन्द्रीय स्थान प्राप्त है और ‘मत’ में या तो ईश्वर की सिरे से कोई परिकल्पना ही नहीं होती; या वह ईश्वर-उदासीन (Agnostic) होता है, या ईश्वर का इन्कारी होता है। फिर भी ‘धर्म’ के अनुयायियों में भी और ‘मत’ के अनुयायियों में भी सभी मौलिक मानवीय गुण और मूल्य (Human Values) पाए जाते हैं।
● धर्म क्या है?…….
उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में ‘धर्म’ विचारणीय वही है जो ‘ईश-केन्द्रित’ (God Centric) हो। इस ‘धर्म’ में ‘ईश्वर पर विश्वास’ करते ही कुछ और तत्संबंधित बातों पर विश्वास अवश्यंभावी हो जाता है;
जैसे: ईश्वर के, स्रष्टा, रचयिता, प्रभु, स्वामी, उपास्य, पूज्य होने पर विश्वास। इसके साथ ही उसके अनेक गुणों, शक्तियों व क्षमताओं पर
भी विश्वास आप से आप अनिवार्य हो जाता है। यहाँ से बात और आगे बढ़ती है। यह जानने के लिए कि ईश्वर की वास्तविकता क्या है; वह हम से अपनी पूजा-उपासना क्या और कैसे कराना चाहता है; हमारे लिए, हमारे जीवन संबंधी उसके आदेश (Instructions), आज्ञाएँ (Injuctions), नियम (Rules), पद्धति (Procedures), आयाम (Dimensions), सीमाएँ (Limits), उसके आज्ञापालन के तरीक़े (Methods) आदि; अर्थात् हमारे और ईश्वर के बीच घनिष्ठ संबंध की व्यापक रूपरेखा क्या हो; हमें उसकी ओर से एक आदेश-पत्र की आवश्यकता है जिसे ‘ईशग्रंथ’ कहा जाता है।
यहाँ से बात थोड़ी और आगे बढ़कर इस बात को अनिवार्य बना देती है कि फिर मनुष्य और ईश्वर के बीच कोई मानवीय आदर्श माध्यम भी हो (जिसे अलग-अलग भाषाओं में पैग़म्बर, नबी, रसूल, ऋषि, Prophet आदि कहा जाता है)। इसके साथ ही यह जानना भी आवश्यक है कि धर्म की ‘मूलधारणा’ क्या है उस मूलधारणा के अंतर्गत और कौन-कौन-सी, मौलिक स्तर की उपधारणाएँ आती हैं, तथा उस मूलधारणा और उसकी उपधारणाओं के मेल से वह कौन-सी परिधि बनती है जो धर्म की सीमाओं को निश्चित व निर्धारित करती है जिसके अन्दर रहकर मनुष्य ‘धर्म का अनुयायी’ रहता है तथा जिसका उल्लंघन करके ‘धर्म से बाहर’ चला जाता, विधर्मी हो जाता है। धर्म यदि वास्तव में ‘धर्म’ है, सत्य धर्म है, शाश्वत धर्म है, सर्वमान्य है, सर्वस्वीकार्य है तथा उसकी सुनिश्चित रूपरेखा व सीमा है तब उसे उस मानवजाति का धर्म होने का अधिकार प्राप्त होता है जो मात्र एक प्राणी, एक जीव ही नहीं, सृष्टि का श्रेष्ठतम अस्तित्व भी है।
● क्या सारे धर्म समान हैं?…..
इस प्रश्न का उत्तर खोजने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बातों का, विचाराधीन आना आवश्यक है: जब ईश्वर मात्र ‘एक’ है; हर जीव-निर्जीव की संरचना उस ‘एक’ ही ईश्वर ने की है, विशेषतः ‘मनुष्यों’ का रचयिता वही ‘एक’ ईश्वर है; यह सृष्टि और ब्रह्माण्ड (जिसका, मनुष्य एक भाग है) उसी ‘एक’ ईश्वर की शक्ति-सत्ता के अधीन है;
मनुष्यों की शारीरिक संरचना ‘एक’ जैसी है; वायुमंडल ‘एक’ है; बुराई, बदी की परिकल्पना भी सारे मनुष्यों में ‘एक’ है, और अच्छाई की परिकल्पना भी ‘एक’ ; सत्य ‘एक’ है जो नैसर्गिक व अपरिवर्तनशील है…..तो फिर धर्म ‘अनेक’ क्यों हों?
जब संसार और सृष्टि की बड़ी-बड़ी हक़ीक़तें, जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध मनुष्य से है, ‘एक’ ही ‘एक’ हैं तो फिर मनुष्यों के लिए धर्म का ‘अनेक’ होना न तार्किक है न बुद्धिसंगत। मस्तिष्क और चेतना इस ‘अनेकता’ को स्वीकार नहीं करती।
● ‘धर्म’ को कैसा होना चाहिए?……
मानव प्राणी चूँकि ‘शरीर’ और ‘आत्मा’ के समन्वय से अस्तित्व पाता है तथा उसके व्यक्तित्व में ये दोनों पहलू अविभाज्य (Inseparable) हैं; इसलिए धर्म ऐसा होना चाहिए जो उसके भौतिक व सांसारिक तथा आध्यात्मिक व नैतिक जीवन-क्षेत्रों में संतुलन व सामंजस्य के साथ अपनी भूमिका निभा सके। (इस्लाम के सिवाय अन्य) धर्मों तथा उनकी अनुयायी क़ौमों का इतिहास यह रहा है कि धर्म ने पूजा-पाठ, पूजास्थल, पूजागृह और कुछ सीमित धार्मिक रीतियों तक तो अपने अनुयायियों का साथ दिया, या ज़्यादा से ज़्यादा कुछ मानवीय मूल्यों और कुछ नैतिक गुणों की शिक्षा देकर कुछ चरित्र-निर्माण, और कुछ समाज-सेवा में अग्रसर कर दिया। इसके बाद, इससे आगे मानवजाति की विशाल, वृहद्, बहुआयामी, बहुपक्षीय, व्यापक जीवन-व्यवस्था में धर्म ने अपने अनुयायियों और अनुयायी क़ौमों का साथ छोड़ दिया। यही बात इस विडंबना का मूल कारण बन गई कि धर्म को व्यवस्था से, व्यवस्था को धर्म से बिल्कुल ही अलग, दूर कर दिया गया। यह अलगाव इतना प्रबल और भीषण रहा कि ‘धर्म’ और ‘व्यवस्था’ एक-दूसरे के प्रतिरोधी, प्रतिद्वंद्वी, शत्रु-समान बन गए।
अतः ‘व्यवस्था’ के संदर्भ में धर्म-विमुखता, धर्म-निस्पृहता, धर्म-उदासीनता यहाँ तक कि धर्म-शत्रुता पर भी आधारित एक ‘‘आधुनिक धर्म’’ ‘सेक्युलरिज़्म’ का आविष्कार करना पड़ा। इस नए ‘‘धर्म’’ ने पुकार-पुकार कर, ऊँचे स्वर में कहा कि (ईश्वरीय) धर्म को सामूहिक जीवन (राजनीति, न्यायपालिका, कार्यपालिका, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, शैक्षणिक व्यवस्था आदि) से बाहर निकाल कर, वहाँ मात्रा इसी ‘‘नए धर्म’’ (सेक्युलरिज़्म) का अधिपत्य स्थापित होना चाहिए। इस प्रकार उपरोक्त धर्मों की अपनी सीमितताओं और कमज़ोरियों के परिणामस्वरूप मानव के अविभाज्य व्यक्तित्व को दो अलग-अलग हिस्सों में विभाजित कर दिया गया। ‘‘व्यक्तिगत पूजा-पाठ में तो ईश्वरवादी, धार्मिक रहना चाहो तो रहो, परन्तु इस दायरे से बाहर निकल कर सामूहिक व्यवस्था में क़दम रखने से पहले, ईश्वर और अपने धर्म को अपने घर में ही रख आओ’’ का मंत्र उपरोक्त ‘नए धर्म’ का ‘मूल-मंत्र’ बन गया।
मनुष्य के अविभाज्य व्यक्तित्व का यह विभाजन बड़ा अप्राकृतिक, अस्वाभाविक, बल्कि अत्याचारपूर्ण था, फिर भी ‘धर्म’ ने अपनी कमज़ोरियों और सीमितताओं के कारण इस नए क्रांतिकारी ‘‘धर्म’’ (सेक्युलरिज़्म) के आगे घुटने टेक दिए।
यह त्रासदी (Tragedy) इस वजह से घटित हुई कि धर्म, जो सामने था, ‘एक’ से ‘अनेक’ में टूट-बिखर चुका था, विषमताओं का शिकार
हो चुका था; जातियों, नस्लों, राष्ट्रीयताओं आदि में जकड़ा जा चुका था अतः अपनी नैसर्गिक विशेषताएँ व गुण (सक्षमता, सक्रियता, प्रभावशीलता, उपकारिता, कल्याणकारिता आदि) खो चुका था।
इस कारणवश उसे, ईश्वरीय धर्म को हटाकर उसकी जगह पर विराजमान हो जाने वाले ईश-उदासीन ‘नए क्रांतिकारी धर्म’ (सेक्युलरिज़्म) के आगे घुटने टेक देने ही थे। इसके बड़े घोर दुष्परिणाम मानव-जाति को झेलने पड़े और झेलने पड़ रहे हैं। उपद्रव, हिंसा, रक्तपात, शोषण, अन्याय, अत्याचार, व्यभिचार, नशाख़ोरी, शराबनोशी, अपराध, युद्ध, बलात्कार, नरसंहार, भ्रष्टाचार, रिश्वत, लूट-पाट, डकैती, चोरी, ग़बन, घोटाले, अपहरण, नग्नता, अभद्रता, अश्लीलता, यौन-अपराध, हत्या आदि का एक सैलाब है जिस पर बाँधा जाने वाला हर बाँध टूट जाता है। इसे मरम्मत करने की जितनी कोशिशें की जाती हैं, उन्हें असफल बनाकर, यह सैलाब पहले से भी ज़्यादा तबाही मचाता, फैलता, आगे बढ़ता-चढ़ता चला जा रहा है। ….
● तो इस समस्या से छुटकारा पाने का उपाय क्या है ?? ….
निसन्देह ये ही न किदुनियाभर मे शांति और प्रेम का माहौल बने इसके लिए जरूरी है कि दुनिया के सभी व्यक्ति एक ही धार्मिक विचारधारा का अनुसरण करें…..
पवित्र कुरान मे सारे मनुष्यों का ईश्वर स्पष्ट रूप से बताता है कि “सारे मनुष्यों का धर्म एक ही था, बाद मे उनमें विभेद हुआ ” – (पवित्र कुरान 10:19)
• उसने तो सब मनुष्यों के लिए एक ही धर्म (इस्लाम) भेजा था, पर मनुष्यों ने ही उस धर्म मे नए नए अनाधिकृत आविष्कार कर के एक धर्म के कई टुकड़े कर के अलग अलग धर्म बना डाले….
• अब आप ही बातये – ‘क्या दुनिया मे शांति और सौहार्द बनाने के लिए ये आवश्यक नहीं कि सारे लोग एक धर्म इस्लाम पर सहमत हो जाएं जो वास्तव मे उन सभी का वास्तविक धर्म है ???’ …..

Musalman Ko Ek Jamat Se Judna Jaruri Hai ?

Musalman Ko Ek Jamat Se Judna Jaruri Hai ?
∗ Sawaal : Kya Musalman Ko Ek Jamat Se Judna Jaruri Hai ? » Jawaab: Haa! Ek Jamat Se Judna Jaruri Hai, Jis’se Muraad Musalmano Ki Jamaat Hai, Hadees Me Jo Jamat Ka Lafz Aata Hai Iss Se Murad Ijtemayat Hai, Lekin Kuch Log Isko Apni Makhsus Taraf Ishara Karte Hai Ke – “Iss Sey Muraad Hum Hai” Ya Iss Se Muraad Aksariyat Aur Akliyat Hai, Ya Falah Aur Falah Hai .. Yaad Rakhiye Jab Bhi Hum Quraan Aur Hadees Ki Roshni Me Haq Aur Baatil Ka Mu’tala Kartey Hai Tou Haq Humesha Aqliyat Me Hi Raha Hai, Thoda Hi Raha Hai. Tou Goya Aksariyat Aur Aqliyat Ka Koi Taqaza Nahi Shariyat Me .. Aur Haa! Haq Haq Hai Fir Chahe Puri Duniya Usey Maaney Ya Uski Mukhalifat Karey .. Tou Kisi Ek Jamaat Se Judna Matlab Musalmano Ki Jamat, Musalmano Se Judna. Kat Ke Nahi Rehna ! Warna Rasool’Allah (Sallallahu Alaihay Wasallam) Farmatey Hai “Shaitan Ke Liye Aasan Hai Uchak Lena” Aur Jitne Bhi Jamate Banti Hai, Tamam Ke Chand Makasid Hai, Aur Unn Makasid Ke Tahat Wo Kaam Karti Hai, Aur Ye Bhi Durust Hai Ismey Koi Harz Nahi,.. Koi Ye Na Kahey Ke Sirf Ek Hi Jamaat Hona Chahiye. Ye Jaruri Nahi Hai, Kyunki Itni Badi Ummat Hai Ke Namumkin Hai Ke Ek Hi Jamat Ek Hi Tanjim Kaam Karey,. Tou Mukhtalif Jamate Mukhatalif Tanjime Kaam Kare, Aur Har Jamate Har Tanjim Ek Dusre Ke Liye Dhaagey Ka Kaam Karey Jis Tarah Har Dhaga Dusre Dhagey Ko Majbuti Dekar Ek Kapda Banata Hai .. Tou Har Jamat Aur Har Tanjim Jodey.. Lekin Masla Yaha Ho Jata Hai Ke – Jab Hum Kisi Se Judtey Hai Hum Todne Lag Jatey Hai … Ek Aam Aadmi Jo Kisi Jamaat Me Na Tha Tou Sabse Acche Tallukat Rakhta Tha,. Lekin Jab Wo Kisi Jamat Se Jud Gaya. Tab Dusre Jamat Walo Se Tassuf Rakhne Laga …. Jo Ki Bohot Hi Galat Hai.. Har Shaksh Apne Karkartagi Ko Apne Mansubo Ko Janey – “Ke Mera Kaam Hai Logo Ko Masjido Se Jodna, Iske Baad Mai Kisi Aur Ke Hawale Kar Du, Ab Aap Yaha Se Usko Aur Aagey Ka Bataye.. ” Tou Har Jamat Ek Dusre Ki Madad Kare, Aur Har Tanjim Ek Dusre Ki Madad Karke Ek Jabardast Nizam Banaye.. Lekin Humare Paas Tod-Tukdo Ka Muamla Ho Gaya.. Ab Aayiye Giney Chuney Thodey Se Musalman Hai Jo Deen Par Chal Rahe, Puri Tadad Agar Le Ley Tou Bohot Badi Hai Musalmano Ki, Inme Se Bohot Thodey Log Hai Jo Kisi Na Kisi Tanjim Se Judey Hai ?? Aur Unme Bhi Itna Kaseer Jhagda Chal Raha Hai Ke Jiski Koi Inteha Nahi.. Subhan’Allah … # Andaza Lagaye Ke Agar Mumbai Me Musalmano Ki Abadi 5 Laakh Hai Tou Unmey Se Kariban 50,000 Log Judey Honge Kisi Na Kisi Jamaat-Tanjim Se. Baaki Tou Waise Hi Hai .. Tou Unko Lana Chorkar Yeh Aapas Me 50,000 Ladh Rahey Hai.. Jo Baaki 450000 Hai Unko Jamaat Aur Tanjimo Se Jodney Ke Bajaye Hum Aapas Me Hi Ladhne Lagey ,.. Chalo Wo Deen Ke Kisi Bhi Tanjim Se Judega, Allah Deen Ki Tadap Dega Tou Kabhi Na Kabhi Haq Par Aajeyga,. Agar Aap Samjhtey Ho Ke Mai Haq Par Hu Tou Wo Haq Par Aajeyga Mere Paas .. Lekin Humare Yaha Bhi Iss Mu’amle Me Bohot Hujjat Hoti Hai.. Ke Mai Haq Par Hu Tou Mere Paas Hi Aana … Yaa Tou 50,001 Hona Tou Mere Paas Aana Ya Baahar Hi Rehna,.. Subhan’Allah … ♥ Allah Rabbul Izzat Quraan Me Farmata Hai – “Tamam Musalman Aapas Me Bhai Bhai Hai Tou Apne Do Bhaiyyon Me Sulah Kara Diya Karo Aur Allah Se Darte Raho Taaki Tum Per Rahem Kiya Jaye. – Al-Quraan 49:10” – @[156344474474186:] Lekin Afsos Humara Tou Aapas Me Jhagda Chal Raha Hai .. Allah Le Liye Baat Ko Samjhey, Kaam Ko Samjhe, Haalat Aur Mouke Ki Nazakat Ko Samjhey.. Log Chah Rahe Hai Ke Hum Alag Ho Aur Hum Wakay Me Harkatey Kar Ke Bata Rahe Hai Ke Hum Alag Hai.. » Sabaq: Overall Apne Momin Bhaiyon Se Judney Ki Koshsih Karey .. Ek Rab, Ek Nabi, Ek Kitab, Ek Ummat Tou Yakinan Tarje Amal Bhi Ek Ho. Aur Purey Dil Se Bhi Ek Ho Iss Tarha Se Hum Jahir Karey .. Tou Aisi Bohot Si Jamate Hai, Tanjime Hai, Aur Hona Chahiye. Taaki Kaam Aur Jyada Se Jyada Badhey.. Aur Insaniyat Ko Fayda Pohchey .. Lekin Agar Koi Iss Niyat Se Idara Kholta Hai Ke Mai Falah Se Ikhtelaf Karu, Tou Unki Niyato Me Ikhlas Nahi Aur Allah Rabbul Izzat Aise Logon Ko Badi Sakht Saza Deta Hai Jo Apni Niyato Me Ikhlas Nahi Rahktey.. Aakhir Me Allah Rabbul Izzat Se Dua

Saturday, 8 August 2015

☆ Aye Imanwalo! Ek Ho Jao ! Nek Ho Jao …

☆  Aye Imanwalo! Ek Ho Jao ! Nek Ho Jao …
Allah Rabbul Izzat Apney Mukkadas Qalaam Quraan Me Farmata Hai –
♥ Al-Quraan: Beshaq Jo Log Apne Deen Ke Tukde Tukde Kar Chukey Hai Aur Firqo Firqo Me Taqsim Ho Chukey Hai Unn Logon Ke Sath (Aye Nabi Sallallahu Alaihi Wa Sallam) Aapka Koi Ta’alluq Nahi,
Unka Mu’amla Tou Sirf Allah Ke Hawale Hai, Fir Jo Kuch Bhi Wo Duniya Me Kiya Karte They Allah Unhey Bata Dega.

– [Surah(6) Al-Aan’aam: Ayat-159]
Iss Aayte Mubarak Ki Tafseer Allah Ke Rasool (Sallallahu Alaihay Wasallam) Ne Khud Bayan Ki Hai:
» Mehfum-e-Hadees: Umar Bin Khattab (Razi’Allahu Anhu) Se Riwayat Hai Ki,
Rasool’Allah (Sallallahu Alaihay Wasallam) Ne Ummul Mo’minin Ayesha (Razi’Allahu Anha) Ko Farmaya –
‘Aye Ayesha! Jo Log Apney Deen Ke Andar Mukhalifat Karke Firqo-Firqo Me Bant Gaye Wo Log Biddati Hai,
Aur Wo Log Apne Apne Nafs Ki Tabedari Karte Hai!
Chuanche Unn Logon Ki Koi Taubah Nahi Aur Unki Koi Taubah Qubul Nahi Hogi!
Mai Unn Logon Se Na Khush Aur Wo Bhi Mujh Se Na Khush’.
– [Tafseere Ibne Kaseer , Vol 2 , Page 263
Mazmaul Zawayed , Vol 2 , Page 75, Tabrani]

#Wajahat: Afsos Ki Baat Hai Ke Aaj Humari Zindagi Ke Tamaam Shobey Kitabo Sunnat Se Khaali Hai,
*Humare Tamaam Amaal Rasool’Allah Ki Sunnat Ke Barkhilaf Hotey Hai ,..
*Yaha Allah Ta’ala Hume Uss Nabi Ki Sunnate Mubarak Par Amal Lazim Kar Raha Hai Jo Tamam Aalam Ke Nabi Hai, Jo Imam-Ul-Ambiya Hai…
*Yeh Nabi Jab Meraz Me Jatey Hai Tou Tamam Ambiya (Alaihi Salato Salam) Ki Imamat Kartey Hai,
*Aise Nabi Ki Ita-At Allah Ta’ala Hum Par Lazim Kar Raha Hai,
*Aur Is Nabi Ki Baatey Chorrkar Hum Iski-Uski Aur Fala Fala Ki Baate Mantey Hai ..
*Quraano Hadees Ko Chodkar Hum Jahilana Aqaid Par Imaan Latey Hai ..
*Mafadparast Logon Ki Baato Me Aa kar Firqo Me Bant Jatey Hai … SubhanAllah !!!
#Aur Fir Hum Khud Ko Aashike Rasool, Ahle Sunnat Wal Jamat, Jannat Ka Mustahik Samjhne Lag Jatey Hai,
*Unn Saari Biddato Ko Sunnat Samajhkar Karte Hai Jiski Na Shariyat Me Koi Asal Hai Aur Naa Hi Rasool’Allah Ki Sunnat Se Saabit Ho, …
*Aur Tou Aur Hum Unn Khurafato Ko Tou Badi Shouk Se Karte Hai Jisey Rasool’Allah (Sallallahu Alaihay Wasallam) Ne Khuley Taur Se #Shirk Aur #Biddat Kaha…
Allah bachaye Hume La-ilmi aur Jahalat ke Fitno se ,..
# Insha’Allah-Ul-Azeez!!!
# Allah Ta’ala Hume Tamaam Kism Ki Gumrahi Se Bachney Ki Taufiq Ata Farmaye..
# Tamam Kism Ke Shirk Aur Biddato Se Humare Imaan Ki Salamti Ata Farmaye…
# Jab Tak Hume Zinda Rakhey Islam Aur Imaan Par Zinda Rakhye…
# Khatma Humara Imaan Par Ho …
!!! Wa Akhiru Dawana Anilhamdulillahe Rabbil A’lameen !!!

☆ ईद उल अजहा (बकराईद) मुबारक ।।। ….

☆  ईद उल अजहा (बकराईद) मुबारक ।।। ….
ईद उल अजहा (बकराईद) हर मुसलमान के लिए एक अहम मौका होता है ।।।
कुछ लोगो की गलतफहमी है कि इस्लाम की स्थापना मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने की,,, ये बात वो बिना लेखक की फालतु किताब वाले बोलेंगे जिन्हे इस्लाम के नाम से हमेशा डराया जाता रहा हो, जबकि वो लोग असली इतिहास से काफी दूर हैं ।।। – @[156344474474186:]
हमारे आका मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से पहले बहुत से नबी आये जिनमे एक नबी थे जिनका नाम इब्राहीम था,,, उनको लगातार सपना आता था कि कोई महबूब चीज की कुर्बानी दी जाए ।।। हजरत इब्राहीम अलैहि. लगातार अपनी सोच के मुताबिक कुर्बानी करते रहे,,, मगर ये ख्वाब उन्हे लगातार आता रहा,,, आखिर मे उन्होने सोचा कि इस दुनिया मे उन्हे सबसे प्यारी चीज है उनकी औलाद हजरत इस्माईल अलैहि. ,,,
अब ये अपनी औलाद इस्माईल को लेकर अल्लाह के हुक्म पर कुर्बान करने चल दिए,,, इब्राहीम अलैहि. ने इस्माईल को उल्टा लिटा दिया और खुद की आँख पर पट्टी बांध ली,,, जब इब्राहीम अलैहि. बेटे की गर्दन पर छुरी चलाने लगे तो अल्लाह के हुक्म से एक दुम्बा बीच मे आ गया जो जिबह हो गया ।।। और हजरत इब्राहीम की कुर्बानी को इतना कुबूल किया गया कि कयामत तक आने वालो पर हलाल जानवर की कुर्बानी का हुक्म दिया गया ।।।
अल्लाह पाक कभी भी किसी का नुकसान नही चाहता मगर आजमाता जरुर है,,, इसी कुर्बानी के अम्ल को हम आज भी करते हैं,,, मगर इस कुर्बानी का हक होता है कि इसके गोश्त के तीन हिस्से किये जाए,,, पहला खुद का,,, दूसरा रिश्तेदारो का,,, और तीसरा गरीबो का ।।।
कुर्बानी का जानवर ज़िबह करते वक्त नीचे लिखी दुआ पढनी सुन्नत है ।।। अगर कुर्बानी अपने और अपने घरवालों की तरफ़ से है तो कहना चाहिये :- “बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर अल्लाहुम्मा मिन्का व लका अल्लाहुम्मा तकब्बल मिन्नी व अहलेबयती बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर
और अगर दूसरे के जानवर को आप जिबह कर रहे हैं तो कहना चाहिये : “बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर अल्लाहुम्मा मिन्का व लका अल्लाहुम्मा तकब्बल मिन…………”
के बाद उसका नाम लें (जिसके नाम की कुर्बानी हो) और “बिस्मिल्लाहे वल्लाहुअकबर” कह कर ज़िबह करना चाहिये ।।।
(दीनी किताब कसासुल अंबिया, बुखारी शरीफ, फजाइले आमाल के मुताबिक)
Ummat-e-Nabi.com के पूरी टीम की तरफ से तमाम उम्मते मुस्लिमा को ईद उल अजहा की बेशुमार नेअमते मुबारक हो …
– दुआ की दरख्वास्त (मोहम्मद सलीम)

☆ Biddat Ki Haqeeqat

☆  Biddat Ki Haqeeqat:
# DEEN ME BIDDATO KA NUQSAAN
Allah Ne Duniya Me Tou Hume Ijajat Di Thi Biddate Karne Ki ,.. Lekin Waha Tou Ijadad, Invension Aur Discoveries Chorr Di Aur Humne Deen Ke Andar Ijadad Shuru Kar Diye ,…
Deen Ke Andar Biddato Ke Badey-Badey Towers Khadey Kar Diye,.. Subhan’Allah !!!
Aur Jiska Nuqsaan Ye Hua Ke Agar Koi NonMmuslim Aisi Biddatto Ko Deen Samajh Ley Tou Jo Bhi Uske Andar Deen-e-Islam Se Ragbat Thi Wo Bhi Khatm Ho Jayegi Aur Yahi Sochega Ke Islam Tou Hamare Dharm Se Bhi Sakhgt Ho Gaya ,..
*Ye Karo, *Wo Karo,.. *Hazaro Mazaro Par Hazri Do ,.. *Mare Tou Iitey Kilo Chawal Do, *10 Wa , *30 Wa, *40 Wa Manao,.. *365 Din Me Hazaro Urs Manao,.. *Hatta Ke Apne Nabi Ke Wafat Ke Deen (12 Rabbil Awwal) Ko Bhi Khushiya Manao (Nauzubillah Summa Nauzubillah),..
Ye Sab Dekhkar Koi Bhi NonMuslim Kahega Ke – “Mai Jaha Hu Wahi Thik Hu ,.”
Yaad Rakhiye Ye Deen Bohot Aasan Hai ,.. Hikmto Se Bhara Hai ,.. Iss Deen Ko Rasool’Allah(ﷺ) Ne Mukkamil Kar Diya Hai,.. Isme Ab Koi Naya Akida, Naya Amal Shameel Nahi Ho Sakta,..
Aur Jo Koi Iss Deen Me Naya Aqeeda Ijad Karega Wo Rab Ke Nazdeek Mardud Hoga,.. Kyuni Usney Ilzam Lagaya Rasool’Allah(ﷺ) Ke Deen Par, Aapki Risalat Par ,..
Ke Ye Falah-Falah Neki Jo Humne Ijdad Ki Hai Wo Neki Rasool’Allah(ﷺ) Ko Maloom Na Thi Isiliye Aapne Nahi Ki ,.. (Maaz’Allah) ,..
Tou Deen Me Biddat Karna Bohot Badi Khabahat Hai,.. Bohot Badi Bimari Hai ,… Ye Ummat Ke Taubao Ko Kabool Nahi Hone Deti…
*Allah Ke Paas Biddat Karnewalo Ke Koi Amal Kaabile Kabool Nahi Hotey,..
*Houz-e-Kousar Se Bhi Hakaal Diye Jaynge ,…
*Rasool’Allah(ﷺ) Ki Aakhri Wasiyat Aur Jo Darr Ka Ijhaar Aapne Kiya Wo Yahi Tha Ke Deen Me Biddate Ijad Mat Karna,.
Aur Aapne Iss Baat Ki Wajahat Bhi Kar Di – “Ke Jo Koi Humare Deen Me Nayi Cheez Ijad Karega Wo Mardud Kar Diya Jayega,.. Uski Tauba Bhi Kabool Nahi Hogi Aur Uska Thikana Jahannum Ki Aag Hogi ,…”
• SABAQ: Tou Lihaja Har Muamlo Me Sunnat Ko Apne Upar Lazim Aur Farz Jaane, Uspe Agar Hum Amal Karey Tou Insha’Allah-Ul-Azeez Biddate Humari Zindagiyo Se Nikalti Jayegi,..
*Lekin Humne Agar Sunnato Ko Chorr Diya Tou Ye Biddate Humare Zindagi Ka Hissa Ban Jayengi..
Yaad Rakhiye Sunnat-Sunnat Hoti Hai,.. Is Se Mohabbat Wo Rasool’Allah(ﷺ) Se Mohabbat Hai ,..
Aur Rasool’Allah(ﷺ) Se Mohabbat Wo Jannat Me Jaane Ki Zaamin Hogi Humare Liye ,….
Agar Ye Hum Karenge Tou Duniya Me Bhi Surkhuru Honge Aur Insha’Allah-Ul-Azeez Duniya Me Kuch Na Hua Tou Aakhirat Me Tou Jarur Surkhuru Honge ,..
*Allah Ke Paas Kaamiyab Kehlayenge ,.. *Aur Khub Ajr Payenge Apne Aamal Ka,.. Chahe Fir Thodey Hi Kyu Na Ho,..
• Lekin Agar Biddat Kar Ke Khub Amal Bhi Karenge Tou “Aamilatun Nasiba, Tasla Naran Hamiya” – (Surah Ghasiya Ayat 3-4) Yaani Kitna Hi Amal Karo Lekin Jahannum Ke Indhan Ban’ne Wale Hai ,..
Tou Lihaja Agar Apne Amaal Ko Kabuliyat Tak Pohchana Hai ,.. Tou Sunnat-e-Rasool Ko Thamey Aur Deen Me Har Nayi Biddat Se, Har Naye Akide Se Airaz Karey,. Insha’Allah-Ul-Azeez Hume Kamiyabi Milegi ,…
*Allah Rabbul Izzat Se Aakhir Me Dua Hai Ke Allah Hume Kehne Aur Sun’ne Se Jyada Amal Ki Taufiq Dey ,…
*Hume Sunnat-e-Rasool Ka Muttabey Banaye ,..
*Rasool’Allah(ﷺ) ki Sacchi Mohabbat hum’me Daley ,..
*Unke Tareeke par Chalna Humare Liye Aasan Kare ,…
*Sunnato Ko Samjhna aur Uspar Chalna Humare Liye Aasan Kare,..
*Humari Naslo me Sunnat-e-Rasool Ko Baaqi rakhe ,..
*Aur Tamam Kism Ke Jahilana Aqaid Se Humare Imaan Ki Salamti Ata Farmaye ,..
# Jab Tak Hume Zinda Rakhey Islam Aur Imaan Par Zinda Rakhye…
# Khatma Humara Imaan Par Ho …
!!! Wa Akhiru Dawana Anilhamdulillahe Rabbil A’lameen !!!

☆ सिरत-उन-नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) – संक्षिप्त जीवन परिचय

☆  सिरत-उन-नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) – संक्षिप्त जीवन परिचय
मुह्म्मदुर्र सूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) संक्षिप्त जीवन परिचय
Life Story Of Allah’s Messanger Mohammad (Sallallahu Alaihay Wasallam)

अल्लाह ने अपने आखिरी नबी, मुह्म्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर अपना आखिरी पैगाम कुरआन शरीफ़ नाज़िल किया था। कुरआन शरीफ़ जो सारी इन्सानियत के लिये नाज़िल हुआ है, जो रहम और बरकत की किताब है।
अगर आपको एक मुस्लमान की ज़िन्दगी क्या होती है देखनी है तो आप नबी करीम मुह्म्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िन्दगी से अच्छी मिसाल दुनिया में कोई नही है। आज हम आपके जीवन का एक संक्षिप्त परिचय पढेंगे…..
» हसब-नसब (वंश) {पिता की तरफ़ से} :- मुह्म्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बिन (1) अब्दुल्लाह बिन (2) अब्दुल मुत्तलिब बिन (3) हाशम बिन (4) अब्दे मुनाफ़ बिन (5) कुसय्य बिन (6) किलाब बिन (7) मुर्रा बिन (8) क-अब बिन (9) लुवय्य बिन (10) गालिब बिन (11) फ़हर बिन (12) मालिक बिन (13) नज़्र बिन (14) कनाना बिन (15) खुज़ैमा बिन (16) मुदरिका बिन (17) इलयास बिन (18) मु-ज़र बिन (19) नज़ार बिन (20) मअद बिन (21) अदनान……………………(51) शीस बिन (52) आदम अलैहिस्सल्लाम। { यहां “बिन” का मतलब “सुपुत्र” या “Son Of” से है } अदनान से आगे के शजरा (हिस्से) में बडा इख्तिलाफ़ (मतभेद) हैं। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने आपको “अदनान” ही तक मन्सूब फ़रमाते थे। – @[156344474474186:]
» हसब-नसब (वंश) {मां की तरफ़ से} :- मुह्म्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बिन (1) आमिना बिन्त (2) वहब बिन (3) हाशिम बिन (4) अब्दे मुनाफ़…………………। आपकी वालिदा का नसब नामा तीसरी पुश्त पर आपके वालिद के नसब नामा से मिल जाता है।
» बुज़ुर्गों के कुछ नाम :- वालिद (पिता) का नाम अब्दुल्लाह और वालिदा (मां) आमिना। चाचा का नाम अबू तालिब और चची का हाला। दादा का नाम अब्दुल मुत्तलिब, दादी का फ़ातिमा। नाना का नाम वहब, और नानी का बर्रा। परदादा का नाम हाशिम और परदादी का नाम सलमा।
» पैदाइश :- आप सल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैदाइश की तारीख में कसीर इख्तेलाफ़ पाया जाता है ,.. जैसे ८, ९, १२ रबीउल अव्वल ,.. एक आमुल फ़ील (अब्रहा के खान-ए-काबा पर आक्रमण के एक वर्ष बाद) 22 अप्रैल 571 ईसवीं, पीर (सोमवार) को बहार के मौसम में सुबह सादिक (Dawn) के बाद और सूरज निकलने से पहले (Before Sunrise) हुय़ी। (साहित्य की किताबों में पैदाइश की तिथि 12 रबीउल अव्वल लिखी है वह बिल्कुल गलत है, दुनिया भर में यही मशहूर है लेकिन उस तारीख के गलत होने में तनिक भर संदेह नही)
» मुबारक नाम :- आपके दादा अब्दुल मुत्तालिब पैदाइश ही के दिन आपको खान-ए-काबा ले गये और तवाफ़ करा कर बडी दुआऐं मांगी। सातंवे दिन ऊंट की कुर्बानी कर के कुरैश वालों की दावत की और “मुह्म्मद” नाम रखा। आपकी वालिदा ने सपने में फ़रिश्ते के बताने के मुताबिक “अहमद” नाम रखा। हर शख्स का असली नाम एक ही होता है, लेकिन यह आपकी खासियत है कि आपके दो अस्ली नाम हैं। “मुह्म्मद” नाम का सूर: फ़तह पारा: 26 की आखिरी आयत में ज़िक्र है और “अहमद” का ज़िक्र सूर: सफ़्फ़ पारा: 28 आयत न० 6 में है। सुबहानल्लाह क्या खूबी है।
» दूध पीने का ज़माना :- सीरत की किताबों में लिखा है कि आपने 8 महिलाओं का दूध पिया। (1) अपनी वालिदा आमिना (2) अबू लहब की नौकरानी सुवैबा (3) खौला (4) सादिया (5) आतिका (6) आतिका (7) आतिका (इन तीनों का एक ही नाम था) (8) दाई हलीमा सादिया । वालिदा मे लगभग एक सप्ताह और इतने ही समय सुवैबा ने दूध पिलाया । इसके बाद दाई हलीमा सादिया की गोद में चले गये । और बाकी 5 दूध पिलाने वालियों के बारे में तफ़्सील मालूम न हो सकी । पालन–पोषण :- लग-भग एक माह की आयु में पालन-पोषण के लिये दाई हलीमा की देख-रेख में सौंप दियेगये । आप चार-पांच वर्ष तक उन्ही के पास रहे । दर्मियान में जब भी मज़दूरी लेने आती थी तो साथ में आपको भी लाती थीं और मां को दिखा-सुना कर वापस ले जाती थी।
» वालिद (पिता) का देहान्त :- जनाब अब्दुल्लाह निकाह के मुल्क शाम तिजारत (कारोबार) के लिये चले गये वहां से वापसी में खजूरों का सौदा करने के लिये मदीना शरीफ़ में अपनी दादी सल्मा के खानदान में ठहर गये। और वही बीमार हो कर एक माह के बाद 26 वर्ष की उम्र में इन्तिकाल (देहान्त) कर गये। और मदीना ही में दफ़न किये गये । बहुत खुबसुरत जवान थे। जितने खूबसूरत थे उतने ही अच्छी सीरत भी थी। “फ़ातिमा” नाम की एक महिला आप पर आशिक हो गयी और वह इतनी प्रेम दीवानी हो गयी कि खुद ही 100 ऊंट दे कर अपनी तरफ़ मायल (Attract) करना चाहा, लेकिन इन्हों ने यह कह कर ठुकरा दिया कि “हराम कारी करने से मर जाना बेहतर है”। जब वालिद का इन्तिकाल हुआ तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मां के पेट में ही थे।
» वालिदा (मां) का देहान्त :- वालिदा के इन्तिकाल की कहानी बडी अजीब है। जब अपने शौहर की जुदाई का गम सवार हुआ तो उनकी ज़ियारत के लिये मदीना चल पडीं और ज़ाहिर में लोगों से ये कहा कि मायके जा रही हूं। मायका मदीना के कबीला बनू नज्जार में था। अपनी नौकरानी उम्मे ऐमन और बेटे मुह्म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को लेकर मदीना में बनू नज्जार के दारुन्नाबिगा में ठहरी और शौहर की कब्र की ज़ियारत की। वापसी में शौहर की कब्र की ज़ियारत के बाद जुदाई का गम इतना घर कर गया कि अबवा के स्थान तक पहुचंते-पहुचंते वहीं दम तोड दिया। बाद में उम्मे ऐमन आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को लेकर मक्का आयीं।
» दादा-चाचा की परवरिश में :- वालिदा के इन्तिकाल के बाद 74 वर्ष के बूढें दादा ने पाला पोसा। जब आप आठ वर्ष के हुये तो दादा भी 82 वर्ष की उम्र में चल बसे। इसके बाद चचा “अबू तालिब” और चची “हाला” ने परवरिश का हक अदा कर दिया।
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सब से अधिक परवरिश (शादी होने तक) इन्ही दोनों ने की। यहां यह बात ज़िक्र के काबिल है कि मां “आमिना” और चची “हाला” दोनो परस्पर चची जात बहनें हैं। वहब और वहैब दो सगे भाई थे। वहब की लडकी आमिना और वहैब की हाला (चची) हैं। वहब के इन्तिकाल के बाद आमिना की परवरिश चचा वहैब ने की। वहैब ने जब आमिना का निकाह अब्दुल्लाह से किया तो साथ ही अपनी लडकी हाला का निकाह अबू तालिब से कर दिया। मायके में दोनों चचा ज़ात बहनें थी और ससुराल में देवरानी-जेठानीं हो गयी। ज़ाहिर है हाला, उम्र में बडी थीं तो मायके में आमिना को संभाला और ससुराल में भी जेठानी की हैसियत से तालीम दी, फ़िर आमिना के देहान्त के बाद इन के लडकें मुह्म्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पाला पोसा। आप अनुमान लगा सकते हैं कि चचा और विशेषकर चची ने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की परवरिश किस आन-बान और शान से की होगी एक तो बहन का बेटा समझ कर, दूसरे देवरानी का बेटा मानकर….।
» आपका बचपन :- आपने अपना बचपन और बच्चों से भिन्न गुज़ारा। आप बचपन ही से बहुत शर्मीले थे। आप में आम बच्चों वाली आदतें बिल्कुल ही नही थीं। शर्म और हया आपके अन्दर कूट-कूट कर भरी हुयी थी। काबा शरीफ़ की मरम्मत के ज़माने में आप भी दौड-दौड कर पत्थर लाते थे जिससे आपका कन्धा छिल गया। आपके चचा हज़रत अब्बास ने ज़बरदस्ती आपका तहबन्द खोलकर आपके कन्धे पर डाल दिया तो आप मारे शर्म के बेहोश हो गये।
दायी हलीमा के बच्चों के साथ खूब घुल-मिल कर खेलते थे, लेकिन कभी लडाई-झगडा नही किया। उनैसा नाम की बच्ची की अच्छी जमती थी, उसके साथ अधिक खेलते थे। दाई हलीमा की लडकी शैमा हुनैन की लडाई में बन्दी बनाकर आपके पास लाई गयी तो उन्होने अपने कन्धे पर दांत के निशान दिखाये, जो आपने बचपन में किसी बात पर गुस्से में आकर काट लिया था।
» तिजारत का आरंभ :- 12 साल की उम्र में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपना पहला तिजारती सफ़र(बिज़नेस टुर) आरंभ किया जब चचा अबू तालिब अपने साथ शाम के तिजारती सफ़र पर ले गये। इसके बाद आपने स्वंय यह सिलसिला जारी रखा। हज़रत खदीजा का माल बेचने के लिये शाम ले गये तो बहुत ज़्यादा लाभ हुआ। आस-पास के बाज़ारों में भी माल खरीदने और बेचने जाते थे।
» खदीजा से निकाह :- एक बार हज़रत खदीजा ने आपको माल देकर शाम(Syria Country) भेजा और साथ में अपने गुलाम मैसरा को भी लगा दिया। अल्लाह के फ़ज़्ल से तिजारत में खूब मुनाफ़ा हुआ। मैसरा ने भी आपकी ईमानदारी और अच्छे अखलाक की बडी प्रशंसा की। इससे प्रभावित होकर ह्ज़रत खदीजा ने खुद ही निकाह का पैगाम भेजा।
आपने चचा अबू तालिब से ज़िक्र किया तो उन्होने अनुमति दे दी। आपके चचा हज़रत हम्ज़ा ने खदीजा के चचा अमर बिन सअद से रसुल’अल्लाह के वली (बडे) की हैसियत से बातचीत की और 20 ऊंटनी महर (निकाह के वक्त औरत या पत्नी को दी जाने वाली राशि या जो आपकी हैसियत में हो) पर चचा अबू तालिब ने निकाह पढा। हज़रत खदीजा का यह तीसरा निकाह था, पहला निकाह अतीक नामी शख्स से हुआ था जिनसे 3 बच्चे हुये। उनके इन्तिकाल (देहान्त) के बाद अबू हाला से हुआ था।
निकाह से समय आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आयु 25 वर्ष और खदीजा की उम्र 40 वर्ष थी।
» गारे-हिरा में इबादत :- हज़रत खदीजा से शादी के बाद आप घरेलू मामलों से बेफ़िक्र हो गये। पानी और सत्तू साथ ले जाते और हिरा पहाडी के गार (गुफ़ा) में दिन-रात इबादत में लगे रहते। मक्का शहर से लगभग तीन मील की दूरी पर यह पहाडी पर स्थित है और आज भी मौजुद है। हज़रत खदीजा बहुत मालदार थी इसलिये आपकी गोशा-नशीनी (काम/इबादत/ज़िन्दगी) में कभी दखल नही दिया और न ही तिजारत का कारोबार देखने पर मजबूर किया बल्कि ज़ादे-राह (रास्ते के लिये खाना) तय्यार करके उनको सहूलियत फ़रमाती थीं।
» समाज-सुधार कमेटी :- हिरा के गार में इबादत के ज़माने में बअसर लोगों की कमेटी बनाने का मशवरा आपही ने दिया था और आप ही की कोशिशों से यह कमेटी अमल में लायी गयी थी। इस कमेटी का मकसद यह था कि मुल्क से फ़ितना व फ़साद खत्म करेंगे, यात्रियों की सुरक्षा करेंगे और गरीबों की मदद करेंगे।
» सादिक-अमीन का खिताब :- जब आप की उम्र 35 वर्ष की हुयी तो “खान-ए-काबा” के निर्माण के बाद “हज-ए-अस्वद” के रखने को लेकर कबीलों के दर्मियान परस्पर झगडां होने लगा। मक्का के लोग आप को शुरु ही से “अमीन” और “सादिक” जानते-मानते थे, चुनान्चे आप ही के हाथों इस झगडें का समापन कराया और आप ने हिकमत और दुर-अन्देशी से काम लेकर मक्का वालों को एक बहुत बढे अज़ाब से निजात दिलाई।
» नबुव्वत-रिसालत :- चांद के साल के हिसाब से चालीस साल एक दिन की आयु में नौ रबीउल अव्वल सन मीलादी (12 फ़रवरी ६१ ईंसवी) दोशंबा के दिन आप पर पहली वही (सन्देंश) उतरी। उस समय आप गारे-हिरा में थे। नबुव्वत की सूचना मिलते ही सबसे पहले ईमान लाने वालों खदीजा (बीवी) अली (भाई) अबू बक्र (मित्र) ज़ैद बिन हारिसा (गुलाम) शामिल हैं।
» दावत-तब्लीग :- तीन वर्ष तक चुपके-चुपके लोगों को इस्लाम की दावत दी। बाद में खुल्लम-खुल्ला दावत देने लगे। जहां कोई खडा-बैठा मिल जाता, या कोई भीड नज़र आती, वहीं जाकर तब्लीग करने लगे।
» कुंबे में तब्लीग :- एक रोज़ सब रिश्ते-दारों को खाने पर जमा किया। सब ही बनी हाशिम कबीले के थे। उनकी तादाद चालीस के लग-भग थी। उनके सामने आपने तकरीर फ़रमाई। हज़रत अली इतने प्रभावित हुये कि तुरन्त ईमान ले आये और आपका साथ देने का वादा किया।
» आम तब्लीग :- आपने खुलेआम तब्लीग करते हुये “सफ़ा” की पहाडी पर चढकर सब लोगों को इकट्ठा किया और नसीहत फ़रमाते हुये लोगों को आखिरत की याद दिलाई और बुरे कामों से रोका। लोग आपकी तब्लीग में रोडें डालने लगे और धीरे-धीरे ज़ुल्म व सितम इन्तहा को पहुंच गये। इस पर आपने हबश की तरफ़ हिजरत करने का हुक्म दे दिया।
» हिज़रत-हबश :- चुनान्चे (इसलिये) आपकी इजाज़त से नबुव्वत के पांचवे वर्ष रजब के महीने में 12 मर्द और औरतों ने हबश की ओर हिजरत की। इस काफ़िले में आपके दामाद हज़रत उस्मान और बेटी रुकय्या भी थीं । इनके पीछे 83 मर्द और 18 औरतों ने भी हिजरत की । इनमें हज़रत अली के सगे भाई जाफ़र तय्यार भी थे जिन्होने बादशाह नजाशी के दरबार में तकरीर की थी । नबुव्वत के छ्ठें साल में हज़रत हम्ज़ा और इनके तीन दिन बाद हज़रत उमर इस्लाम लाये । इसके बाद से मुस्लमान काबा में जाकर नमाज़े पढने लगे।
 » घाटी में कैद :- मक्का वालों ने ज़ुल्म-ज़्यादती का सिलसिला और बढाते हुये बाई-काट का ऎलान कर दिया । यह नबुव्वत के सांतवे साल का किस्सा है । लोगों ने बात-चीत, लेन-देन बन्द कर दिया, बाज़ारों में चलने फ़िरने पर पाबंदी लगा दी ।
» चचा का इन्तिकाल (देहान्त) :- नबुव्वत के दसवें वर्ष आपके सबसे बडे सहारा अबू तालिब का इन्तिकाल हो गया । इनके इन्तिकाल से आपको बहुत सदमा पहुंचा ।
» बीवी का इन्तिकाल (देहान्त) :- अबू तालिब के इन्तिकाल के ३ दिन पश्चात आपकी प्यारी बीवी हज़रत खदीजा रजी० भी वफ़ात कर गयीं । इन दोनों साथियों के इन्तिकाल के बाद मुशरिकों की हिम्मत और बढ गयी । सर पर कीचड और उंट की ओझडी (आंते तथा उसके पेट से निकलने वाला बाकी सब पेटा वगैरह) नमाज़ की हालत में गले में डालने लगे ।
» ताइफ़ का सफ़र :- नबुव्वत के दसवें वर्ष दावत व तब्लीग के लिये ताइफ़ का सफ़र किया । जब आप वहा तब्लीग के लिये खडें होते तो सुनने के बजाए लोग पत्थर बरसाते । आप खुन से तरबतर हो जाते । खुन बहकर जूतों में जम जाता और वज़ु के लिये पांव से जुता निकालना मुश्किल हो जाता । गालियां देते, तालियां बजाते । एक दिन तो इतना मारा कि आप बेहोश हो गये ।
» मुख्तलिफ़ स्थानों पर तब्लीग :- नबुव्वत के ग्यारवें वर्ष में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रास्तों पर जाकर खडें हो जाते और आने-जाने वालों तब्लीग (इस्लाम की दावत) करते । इसी वर्ष कबीला कन्दा, बनू अब्दुल्लाह, बनू आमिर, बनू हनीफ़ा का दौरा किया और लोगों को दीन इस्लाम की तब्लीग की । सुवैद बिन सामित और अयास बिन मआज़ इन्ही दिनों ईमान लाये ।
» मेराज शरीफ़ :- नबुव्वत के 12 वें वर्ष 27 रजब को 51 वर्ष 5 माह की उम्र में आपको मेराज हुआ और पांच वक्की नमाज़े फ़र्ज़ हुयीं । इससे पूर्व दो नमाज़े फ़ज्र और अस्र ही की पढी जाती थ । इन्ही दिनों तुफ़ैल बिन अमर दौसी और अबू ज़र गिफ़ारी ईमान लाये । इस तारीख में उम्मत में बोहोत इख्तेलाफ़ है .. (अल्लाहु आलम)
» घाटी की पहली बैअत :- नबुव्वत के ग्यारवें वर्ष हज के मौसम में रात की तारीकी में छ: आदमियों से मुलाकात की और अक्बा के स्थान पर इन लोगों ने इस्लाम कुबुल किया । हर्र और मिना के दर्मियान एक स्थान का नाम “अकबा” (घाटी) है । इन लोगों ने मदीना वापस जाकर लोगों को इस्लाम की दावत दी । बारहवें नबुव्वत को वहां से 12 आदमी और आये और इस्लाम कुबूल किया ।
» घाटी की दुसरी बैअत :- 13 नबुव्वत को 73 मर्द और दो महिलाओं ने मक्का आकर इस्लाम कुबुल किया । ईमान उसी घाटी पर लाये थे । चूंकि यह दुसरा समुह था इसलिये इसको घाटी की दुसरी बैअत कहते हैं ।
» हिजरत :- 27 सफ़र, 13 नबुव्वत, जुमेरात (12 सितंबर 622 ईसंवीं) के रोज़ काफ़िरों की आखों में खाक मारते हुये घर से निकले । मक्का से पांच मील की दुरी पर “सौर” नाम के एक गार में 3 दिन ठहरे । वहां से मदीना के लिये रवाना हुये । राह में उम्मे मअबद के खेमें में बकरी का दुध पिया ।
» कुबा पहुंचना :- 8 रबीउल अव्वल 13 नबुव्वत, पीर (सोमवार) के दिन (23 सितंबर सन 622 ईंसवीं) को आप कुबा पहुंचें । आप यहां 3 दिन तक ठहरे और एक मस्ज़िद की बुनियाद रखी । इसी साल बद्र की लडाई हुयी । यह लडाई 17 रमज़ान जुमा के दिन गुयी । 3 हिजरी में ज़कात फ़र्ज़ हुयी । 4 हिजरी में शराब हराम हुयी । 5 हिजरी में औरतों को पर्दे का हुक्म हुआ ।
» उहुद की लडाई :- 7 शव्वाल 3 हिजरी को सनीचर (शनिवार) के दिन यह लडाई लडी गयी । इसी लडाई में रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चन्द सहाबा ने नाफ़रमानी की, जिसकी वजह से कुछ दे के लिये पराजय का सामना करना पडा और आपके जिस्म पर ज़ख्म आये।
» सुलह हुदैबिय्या :- 6 हिजरी में आप उमरा के लिये मदीना से मक्का आये, लेकिन काफ़िरों ने इजाज़त नही दी । और चन्द शर्तों के साथ अगले वर्ष आने को कहा । आपने तमाम शर्तों को मान लिया और वापस लौट गये।
» बादशाहों को दावत :- 6 हिजरी में ह्ब्शा, नजरान, अम्मान, ईरान, मिस्र, शाम, यमामा, और रुम के बादशाहों को दावती और तब्लीगी खत लिखे । हबश, नजरान, अम्मान के बादशाह ईमान ले आये ।
» सात हिजरी :- 7 हिजरी में नज्द का वाली सुमामा, गस्सान का वाली जबला वगैरह इस्लाम लाये । खैबर की लडाई भी इसी साल में हुई ।
» फ़तह – मक्का :- 8 हिजरी में मक्का फ़तह हुआ । इसकी वजह 6 हिजरी मे सुल्ह हुदैबिय्या का मुआहिदा तोडना था । 20 रमज़ान को शहर मक्का के अन्दर दाखिल हुये और ऊंट पर अपने पीछे आज़ाद किये हुये गुलाम हज़रत ज़ैद के बेटे उसामा को बिठाये हुये थे । इस फ़तह में दो मुसलमान शहीद और 28 काफ़िर मारे गये । आप सल्लल्लाहुए अलैहि ने माफ़ी का एलान फ़रमाया ।
» आठ हिजरी :- 8 हिजरी में खालिद बिन वलीद, उस्मान बिन तल्हा, अमर बिन आस, अबू जेहल का बेटा ईकरमा वगैरह इस्लाम लाये और खूब इस्लाम लाये ।
» हुनैन की जंग :- मक्का की हार का बदला लेने और काफ़िरों को खुश रखने के लिये शव्वाल 8 हिजरी में चार हज़ार का लश्कर लेकर हुनैन की वादी में जमा हुये । मुस्लमान लश्कर की तादाद बारह हज़ार थी लेकिन बहुत से सहाबा ने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नाफ़रमानी की, जिसकी वजह से पराजय का मुंह देखना पडा । बाद में अल्लाह की मदद से हालत सुधर गयी ।
» नौ हिजरी :- इस साल हज फ़र्ज़ हुआ । चुनांन्चे इस साल हज़रत सिद्दीक रज़ि० की कियादत (इमामत में, इमाम, यानि नमाज़ पढाने वाला) 300 सहाबा ने हज किया । फ़िर हज ही के मौके पर हज़रत अली ने सूर : तौबा पढ कर सुनाई ।
» आखिरी हज :- 10 हिजरी में आपने हज अदा किया । आपके इस अन्तिम हज में एक लाख चौबीस हज़ार मुस्लमान शरीक हुये । इस हज का खुत्बा (बयान या तकरीर) आपका आखिरी वाज़ (धार्मिक बयान) था । आपने अपने खुत्बे में जुदाई की तरह भी इशारा कर दिया था, इसके लिये इस हज का नाम “हज्जे विदाअ” भी कहा जाने लगा.
» वफ़ात (देहान्त) :- 11 हिजरी में 29 सफ़र को पीर के दिन एक जनाज़े की नमाज़ से वापस आ रहे थे की रास्ते में ही सर में दर्द होने लगा ।
बहुत तेज़ बुखार आ गया । इन्तिकाल से पांच दिन पहले पूर्व सात कुओं के सात मश्क पानी से गुस्ल (स्नान) किया । यह बुध का दिन था । जुमेरात को तीन अहम वसिय्यतें फ़रमायीं । एक दिन कब्ल अपने चालीस गुलामों को आज़ाद किया । सारी नकदी खैरात (दान) कर दी ।
अन्तिम दिन पीर (सोमवार) का था । इसी दिन 12 रबीउल अव्वल 11 हिजरी चाश्त के समय आप इस दुनिया से तशरीफ़ ले गये । इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन । चांद की तारीख के हिसाब से आपकी उम्र 63 साल 4 दिन की थी ।
यह बात खास तौर पर ध्यान में रहे की आपकी नमाजे-जनाज़ा किसी ने नही पढाई । बारी-बारी, चार-चार, छ्ह:-छ्ह: लोग आइशा रजि० के हुजरे में जाते थे और अपने तौर पर पढकर वापस आ जाते थे । यह तरीका हज़रत अबू बक्र रज़ि० ने सुझाया था और हज़रत उमर ने इसकी ताईद (मन्ज़ुरी) की और सबने अमल किया । इन्तिकाल के लगभग 32 घंटे के बाद हज़रत आइशा रज़ि० के कमरे में जहां इन्तिकाल फ़रमाया था दफ़न किये गये ।
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